झारखंड में पेसा नियमावली लागू ग्रामसभा का बढ़ा महत्व

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 पेसा नियमावली लागू ग्रामसभा का बढ़ा महत्व

ग्रामसभा की बैठक पारंपरिक तरीके से बुलायी जायेगी, झारखंड  के संसाधनों की सुरक्षा ग्रामसभा परंपरा से होगा

पेसा नियमावली के तहत परंपरागत पदाधिकारियों को महत्व

ग्रामसभा का अधिकार बढ़ गया है. ग्रामसभा परंपरा व सामुदायिक संसाधानों की रक्षा करेगी. पेसा नियमावली के तहत ग्रामसभा को आदिवासी क्षेत्रों में स्वशासन की सर्वोच्च इकाई के रूप में स्थापित किया गया है. ग्रामसभा की बैठक पारंपरिक तरीके से बुलायी जायेगी. उसमें स्थानीय परंपरागत पदाधिकारियों को महत्व दिया जायेगा.

पेसा नियमावली के तहत ग्रामसभा को आदिवासी क्षेत्रों में स्वशासन की सर्वोच्च इकाई के रूप में स्थापित किया गया है. प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी विकास कार्य, योजना या प्रशासनिक निर्णय में ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य होगी. ग्रामसभा को अपने क्षेत्र के रीति-रिवाज, परंपरा, सामाजिक प्रथाओं और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा का अधिकार प्राप्त होगा. ग्रामसभा न केवल गांव से जुड़े मामलों पर निर्णय लेगी, बल्कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी भी करेगी. इसमें यह भी प्रावधान है कि ग्रामसभा की बैठक पारंपरिक तरीके से बुलायी जायेगी और उसमें स्थानीय परंपरागत पदाधिकारियों की भूमिका को महत्व दिया जायेगा. सरकार का उद्देश्य आदिवासी समाज की स्वशासन व्यवस्था को संवैधानिक और वैधानिक आधार देना बताया गया है.


प्राकृतिक संसाधनों पर ग्रामसभा का अधिकार

पेसा नियमावली में आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों पर ग्रामसभा के अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है. इसके तहत जल, जंगल, जमीन और लघु खनिज संसाधनों से जुड़े निर्णयों में ग्रामसभा की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी. नियमानुसार किसी भी प्रकार के खनन, जल स्रोतों के उपयोग या सामुदायिक भूमि के हस्तांतरण से पहले ग्रामसभा की स्वीकृति आवश्यक होगी. इससे स्थानीय समुदाय को अपने संसाधनों पर नियंत्रण और संरक्षण का कानूनी अधिकार मिलेगा. इसमें यह भी कहा गया है कि ग्रामसभा यह सुनिश्चित करेगी कि संसाधनों का उपयोग स्थानीय हित, पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक आजीविका को नुकसान पहुंचाये बिना हो. यह प्रावधान आदिवासी इलाकों में बाहरी हस्तक्षेप को सीमित करने की दिशा में अहम कदम है.

पारंपरिक स्वशासन संस्थाओं को मान्यता

पेसा नियमावली के तहत आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन संस्थाओं को मान्यता देने की व्यवस्था की गयी है. नियमों में कहा गया है कि ग्रामसभा और स्थानीय प्रशासन निर्णय लेते समय परंपरागत संस्थाओं और पदाधिकारियों की भूमिका को महत्व देगा. अनुसूचित क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही स्वशासन प्रणालियां जैसे मांझी-परगना, मुंडा-मानकी, पाहन, सरदार व अन्य परंपरागत संस्थाएं ग्रामसभा की कार्यप्रणाली का अभिन्न हिस्सा होंगी. इसका उद्देश्य आधुनिक प्रशासनिक ढांचे और पारंपरिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना है, ताकि आदिवासी समाज की पहचान और सामाजिक संरचना सुरक्षित रह सके.


पेसा कानून के मुख्य बिंदु:

स्वशासन: यह अधिनियम अनुसूचित क्षेत्रों के लोगों को ग्राम सभा के माध्यम से स्वशासन का अधिकार देता है।
ग्राम सभा की भूमिका: ग्राम सभा को विकास योजनाओं, सामाजिक-आर्थिक मामलों और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में निर्णायक शक्ति मिलती है।

संसाधनों पर अधिकार: यह जल, जंगल, भूमि और लघु वनोपज जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर जनजातीय समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देता है और उन्हें प्रबंधित करने का अधिकार देता है।

सांस्कृतिक संरक्षण: यह अधिनियम जनजातीय समुदायों की प्रथाओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा और संरक्षण करता है।
परंपरागत तरीकों को सम्मान: यह विवाद समाधान के पारंपरिक तरीकों और स्थानीय मान्यताओं को मजबूत करता है।

उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य जनजातीय आबादी को सशक्त बनाना, सहभागी लोकतंत्र स्थापित करना और उच्च स्तर की पंचायतों को ग्राम सभा की शक्तियों को कम करने से रोकना है।

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